Baba Sahibzada Zorawar Singh Ji : अमर शहादत की ऐतिहासिक गाथा

Sahibzada zorawar singh ji

भारत की पवित्र भूमि ने ऐसे अनेक वीर सपूतों को जन्म दिया है, जिन्होंने धर्म, सत्य और मानवता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उन्हीं महान आत्माओं में Sahibzada Zorawar Singh Ji का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। वे सिखों के दसवें गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के पौत्र थे। बहुत ही कम उम्र में उन्होंने ऐसा बलिदान दिया, जिसे आज भी पूरी दुनिया सम्मान और श्रद्धा के साथ याद करती है।

Sahibzada Zorawar Singh Ji केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं हैं, बल्कि वे साहस, त्याग और अडिग विश्वास का जीवंत उदाहरण हैं।

Sahibzada Zorawar Singh Ji का जन्म और पारिवारिक परिचय

Baba zoravar singh family

साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह जी का जन्म

विषयविवरण
नामसाहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह जी
जन्म तिथि17 नवंबर 1696
जन्म स्थानआनंदपुर साहिब, पंजाब
पिताश्री गुरु गोबिंद सिंह जी
मातामाता अजीत कौर जी / माता जीतो जी / माता सुंदरी जी
दादागुरु तेग बहादुर साहिब जी
दादीमाता गुजरी जी
भाई1. साहिबज़ादा अजीत सिंह जी 2. साहिबज़ादा जुझार सिंह जी 3. साहिबज़ादा फतेह सिंह जी
खालसा परिवारदसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के चार साहिबज़ादों में से तीसरे

बचपन से ही धर्म और वीरता के संस्कार

सामान्य बच्चों की तरह खेलने के साथ-साथ Sahibzada Zorawar Singh Ji को:

  • गुरबाणी का ज्ञान
  • सिख इतिहास की शिक्षा
  • सत्य और न्याय का महत्व
  • साहस और आत्मसम्मान

सिखाया जाता था। छोटी उम्र में ही वे समझ गए थे कि सिख धर्म केवल एक धर्म नहीं, बल्कि सत्य और मानवता का मार्ग है।

विश्वासघात और गिरफ्तारी

एक स्थानीय व्यक्ति गंगू ने लालच में आकर उन्हें मुगल अधिकारियों को सौंप दिया। इसके बाद Sahibzada Zorawar Singh Ji को उनकी दादी और भाई Baba Fateh Singh ji के साथ सरहिंद ले जाया गया।

यह घटना सिख इतिहास के सबसे दुखद अध्यायों में से एक मानी जाती है।

ठंडे बुर्ज में कैद

सरहिंद में उन्हें एक ऊँची और ठंडा बुर्ज

में बंद कर दिया गया, जिसे ठंडा बुर्ज कहा जाता है। वहां:

  • ठंड बहुत अधिक थी
  • भोजन और पानी नहीं दिया गया
  • लगातार डराया और धमकाया गया

लेकिन Sahibzada Zorawar Singh Ji का साहस कम नहीं हुआ।

धर्म परिवर्तन का दबाव

मुगल अधिकारियों ने दोनों साहिबज़ादों से कहा कि अगर वे:

  • सिख धर्म छोड़ दें
  • इस्लाम स्वीकार कर लें

तो उन्हें जीवनदान दिया जाएगा और सुख-सुविधाएं दी जाएंगी।

लेकिन Sahibzada Zorawar Singh Ji ने बहुत दृढ़ता से उत्तर दिया कि:

“हम गुरु गोबिंद सिंह जी के पुत्र हैं।
हम सिख थे, सिख हैं और सिख ही रहेंगे।”

Sahibzada Zorawar Singh Ji जी की अडिग आस्था

इतनी छोटी उम्र में भी Sahibzada Zorawar Singh Ji ने यह सिद्ध कर दिया कि:

  • धर्म सौदे की वस्तु नहीं है
  • सत्य से समझौता नहीं किया जा सकता
  • मृत्यु से डरकर विश्वास नहीं छोड़ा जाता

उनका यह साहस आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करता है।

Sahibzada Zorawar Singh Ji जी की शहादत (Shaheedi)

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साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह जी की शहीदी कब हुई?

26 दिसंबर 1704 ईस्वी
सरहिंद (वर्तमान फतेहगढ़ साहिब, पंजाब)

जब वे अपने धर्म पर अडिग रहे, तब मुगल शासकों ने क्रूर निर्णय लिया।

Sahibzada Zorawar Singh Ji और Sahibzada Fateh Singh Ji को दीवार में ज़िंदा चिनवा दिया गया।

यह घटना मानव इतिहास की सबसे क्रूर घटनाओं में गिनी जाती है।

माता गुजरी जी का बलिदान

जब माता गुजरी जी को अपने दोनों पोतों की शहादत का समाचार मिला, तो उन्होंने भी उसी दिन ठंडा बुर्ज में अपने प्राण त्याग दिए।

इस प्रकार यह केवल दो बच्चों की शहादत नहीं थी, बल्कि पूरे परिवार का महान बलिदान था।

फतेहगढ़ साहिब: शहादत की अमर भूमि

आज जहां Sahibzada Zorawar Singh Ji ने शहादत दी, वहां श्री फतेहगढ़ साहिब गुरुद्वारा स्थित है।

हर वर्ष:

  • दिसंबर माह में
  • शहीदी जोड़ मेला लगता है
  • लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं

Sahibzada Zorawar Singh Ji का ऐतिहासिक महत्व

Sahibzada Zorawar Singh Ji का योगदान केवल सिख इतिहास तक सीमित नहीं है। वे पूरे भारत के लिए प्रेरणा हैं।

उनकी शहादत ने:

  • अन्याय के खिलाफ संघर्ष को बल दिया
  • धर्म की रक्षा का संदेश दिया
  • साहस और आत्मसम्मान को परिभाषित किया

साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह जी से मिलने वाली शिक्षाएँ

1. साहस की कोई उम्र नहीं होती

2. धर्म और सत्य सबसे ऊपर हैं

3. आत्मसम्मान जीवन से बड़ा होता है

4. बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता

निष्कर्ष (Conclusion)

Sahibzada Zorawar Singh Ji की जीवन गाथा साहस, बलिदान और अडिग विश्वास की अमर कहानी है। उनकी शहादत हमें सिखाती है कि सच्चा धर्म वही है, जिसके लिए इंसान अपने प्राण भी न्योछावर कर दे।

वे इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि हर सच्चे दिल में जीवित हैं।

FAQs : Sahibzada Zorawar Singh Ji

1. Sahibzada Zorawar Singh Ji जी कौन थे?

Sahibzada Zorawar Singh Ji सिखों के दसवें गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के पौत्र थे। वे बचपन में ही अपने अडिग विश्वास, साहस और बलिदान के कारण सिख इतिहास के सबसे महान बाल शहीदों में गिने जाते हैं। उनकी शहादत ने धर्म, सत्य और आत्मसम्मान की रक्षा का अमर संदेश दिया।

2. Sahibzada Zorawar Singh Ji का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

Sahibzada Zorawar Singh Ji का जन्म 28 नवंबर 1706 ईस्वी को आनंदपुर साहिब, पंजाब में हुआ था। उनका पालन-पोषण धार्मिक वातावरण में हुआ, जहाँ उन्हें गुरबाणी, सिख इतिहास और नैतिक मूल्यों की शिक्षा मिली।

3. Sahibzada Zorawar Singh Ji की माता और दादी कौन थीं?

उनकी माता का नाम माता सुंदरी जी था और उनकी दादी माता गुजरी जी थीं। माता गुजरी जी ने दोनों साहिबज़ादों को धर्म, साहस और आत्मबल की शिक्षा दी। उनकी भूमिका बच्चों के चरित्र निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

4. Sahibzada Zorawar Singh Ji को सरहिंद कैसे ले जाया गया?

1704 ईस्वी में आनंदपुर साहिब से निकलते समय, एक स्थानीय व्यक्ति गंगू ने लालच में आकर साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह जी, उनके छोटे भाई साहिबज़ादा फतेह सिंह जी और माता गुजरी जी को मुगल अधिकारियों के हवाले कर दिया। इसके बाद उन्हें सरहिंद ले जाया गया।

5. ठंडा बुर्ज क्या थी?

ठंडा बुर्ज सरहिंद में स्थित एक ऊँची मीनार थी, जहाँ साहिबज़ादों और माता गुजरी जी को कठोर सर्दी में बंद रखा गया। वहाँ न भोजन दिया गया, न पानी। फिर भी उनका आत्मबल और विश्वास डिगा नहीं।

6. क्या Sahibzada Zorawar Singh Ji पर धर्म परिवर्तन का दबाव डाला गया था?

हाँ, मुगल अधिकारियों ने उन्हें इस्लाम स्वीकार करने पर जीवन और सुख-सुविधाओं का लालच दिया। लेकिन इतनी छोटी उम्र में भी Sahibzada Zorawar Singh Ji ने साफ शब्दों में मना कर दिया और अपने सिख धर्म पर अडिग रहे।

7. Baba Zorawar Singh Ji की शहादत कब और कैसे हुई?

साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह जी की शहादत 26 दिसंबर 1704 ईस्वी को सरहिंद (वर्तमान फतेहगढ़ साहिब) में हुई। उन्हें और उनके छोटे भाई साहिबज़ादा फतेह सिंह जी को दीवार में ज़िंदा चिनवा दिया गया। यह इतिहास की सबसे क्रूर घटनाओं में से एक है।

8. माता गुजरी जी का बलिदान क्यों महत्वपूर्ण है?

अपने दोनों पोतों की शहादत का समाचार सुनकर माता गुजरी जी ने भी उसी दिन ठंडा बुर्ज में प्राण त्याग दिए। उनका बलिदान धैर्य, त्याग और आध्यात्मिक शक्ति का अनुपम उदाहरण है।

9. फतेहगढ़ साहिब का सिख इतिहास में क्या महत्व है?

फतेहगढ़ साहिब वह पवित्र स्थान है जहाँ साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह जी ने शहादत दी। यहाँ हर वर्ष दिसंबर में शहीदी जोड़ मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु श्रद्धा के साथ दर्शन करने आते हैं।

10. आज के समय में Sahibzada Zorawar Singh Ji से हमें क्या सीख मिलती है?

साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह जी हमें सिखाते हैं कि:
साहस की कोई उम्र नहीं होती
धर्म और सत्य सर्वोपरि हैं
आत्मसम्मान जीवन से बड़ा है
सच्चे विश्वास के लिए हर बलिदान मूल्यवान होता है

11. 2025 में बाबा ज़ोरावर सिंह जी शहीदी दिवस कब मनाया जाएगा?

2025 में बाबा ज़ोरावर सिंह जी (छोटे साहिबज़ादे) का शहीदी दिवस 26 दिसंबर 2025 को मनाया जाता है। यह वही दिन है जब उन्होंने अपने छोटे भाई साहिबज़ादा फतेह सिंह जी के साथ धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दिया था।

12. छोटे साहिबज़ादों की शहादत किस दिन हुई थी?

छोटे साहिबज़ादे, साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह जी और साहिबज़ादा फतेह सिंह जी की शहादत 26 दिसंबर 1704 को हुई थी। इसी दिन को आज “वीर बाल दिवस” के रूप में मनाया जाता है, ताकि इन दोनों नन्हे वीरों के अद्वितीय साहस और बलिदान को याद रखा जा सके।

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